किसी और की नहीं, अपनी ही आपबीती सुना रहा हूँ,
एक वर्ष पहले की कहानी, अब आपके सामने ला रहा हूँ
पड़ेशान हुआ था मै अपने ही डाक्टर से,
जिसने किया था गलत उपचार अपने ही हाथो से
बच गई जान क्या बताऊ कैसे,
अस्पताल से भाग निकला जैसे तैसे
घर आने के बाद था मेरा बुरा हाल ,
कभी सरदर्द कभी पैरदर्द से था बेहाल
जान तो बची पर हजारों का हुआ नुकसान ,
बुरा हाल था, नहीं मिल रहा था कोई समाधान
फिर वकील बाबु से मिलने का आया ख्याल,
जाकर मिला और बता दिया अपना हाल
वकील ने झतिपुर्ति का मुक़दमा करने की दी सलाह,
फिर क्या था हमने भी, बढ़ा दिया मामला
बात आगे बढ़ी, पहुँच गयी वकालत ,
कंपनसेशन की आस में , तबियत भी हो गयी सही सलामत
दोनों ओंर से आरोप-प्रत्यारोप भी हो गया था शुरू
बन गया था शिष्य अपने वकील का और वो था मेरा गुरु
लोगों ने डाक्टर को आत्मसमपर्ण करने के लिएसमझाया
हम दोनों के वकील ने भी समझोते के लिए राज़ी करवाया
हम सब वकालत के बाहर मिले करने को समझोता
दोनों वकीलों के चमचे पहुँच गये वहाँ बिन न्योता
डाक्टर ने मेरे फीस के पचास हज़ार मेज़ पर थमाया
दोनों वकील ने पच्चीस पच्चीस लिए और हमसे हाथ मिलाया
मैंने चिल्लाया दे दो मेरे पचास हज़ार
पर इसमेंभी कोई बाधा हो तो दे दो केवल पच्चीस हज़ार
वकील साहब ने मुझे समझाया
बचपन की वो कहानी याद दिलाया
वर्षो से यही रीत चली आ रही हैं,
भला दो बिल्ली की लड़ाई में , कभी बन्दर की हार हुई हैं।
No comments:
Post a Comment