Sunday, August 17, 2014

बज़ार का सफ़र - नत्थू हलवाई

खाने का बहुत मन कर रहा था मिठाई
सोचा बज़ार से लेकर आता हुँ रसमलाई
पहुँचा मौहल्ले के नत्थू हलवाई की दुकान
देखते ही मन मोह लिया उसके तरह तरह के पकवान

मैंने पूछा नत्थू भैया मिठाइयों के बीच में रहते हो दिन भर
क्या आपका मन नहीं करता खाने को तनिक भर
रोक कैसे लेतो  हो अपने आप को इतना
ये राज़ ज़रा हमें भी बताना

नत्थू बोला -
कवि भाई अब आप से क्या छुपाना, खाने के लिए मिठाई उठता हुँ हाथ पर
पर क्या करे बिज़नस भी तो है करना , इसलिए रख देता हूँ सिर्फ चाट कर
सुन के हो गया मैं दंग ,
उड़ गए मेरे चेहरे का रंग
जवाब सुन के हालत हो गया था हालत एकदम खास्ता
वहाँ से निकलने को मैंने लिया अपना रास्ता

तभी नत्थू ने मुसकुराया, मुझे अपने पास बुलाया
और बोला, भाई ये तो था बस मज़ाक
बताईये क्या दू आज आपको ख़ास
मैंने कहा होश उडा के लगाते हो मरहम
कोई नहीं, खिला दो आधा किलो जिलेबी गरमा गरम

जैसे ही रखा जिलेबी तराजू पर, मैंने कहा भाई दिल आगया आपके बर्फी पर
नत्थू बोला कोई नहीं सरकार , जिलेबी रहने दो , बर्फी ले जाओ इसबार
बर्फी देते हुए बोला, बर्फी हैं मिठाईयो का शहजादा
मैंने कहा लगता है ये ठंडा थोडा ज्यादा
नत्थू बोला ये है मेरा वादा , वही खिलावुन्गा जो है आपका इरादा
मैंने कहा जब खीलानी है मिठाई तो पैक कर दो आधा किलो बालूशाही

जब नाप रहा था बालूशाही तो मैंने कहा रहने दो,
बदले में दे दो रसमलाई
नत्थू बोला कवि भाई आज अपने मुझे बहुत ही है नचाया
फिर उसने एक हाथ में रसमलाई और दूसरे में बिल थमाया

मैंने कहा जब मैंने आप से कुछ नहीं है खरीदा
तो बताओ ये बिल किस चीज़ का
नत्थू बोला क्या भाई रसमलाई भी खाओगे
और पैसे भी नहीं भरोगे
मैंने कहा अपने ग्राहक को ऐसे ही तंग करोगे
जब कुछ लिया ही नहीं तो पैसे किस बात के लोगे
जब लिया मैंने रसमलाई तो वापस भी तो किया बालूशाही
बालूशाही के बदले बर्फी और बर्फी के बदले की तो थी वापस जिलेबी

नत्थू बोला आपकी बात तो ठीक लगती है
नहीं कुछ तो जिलेबी के पैसे भी तो बनती है
मैंने कहा याद करो नत्थू भाई, ये बात हुई कैसे
जब मैंने ली नहीं जिलेबी, तो किस बात के पैसे

सुन के बात नत्थू हो गया हैरान
खुला का खुला ही रह गया उसका मुँह और दोनों कान
मैंने कहा नत्थू भैया बेचो मिठाई हँसते -हँसते
फिर मिलेंगे अच्छा भैया नमस्ते
कुछ दूर जाकर मैं वापस आया , नत्थू के हाथ में पैसा थमाया
मुस्कुराया ,
और  कहा मज़ाक और रसमलाई दोनों का हिसाब बराबर चुकाया

मेरीआपबीती

  
किसी और की नहीं, अपनी ही आपबीती सुना रहा हूँ,  
एक वर्ष पहले की कहानी, अब आपके सामने  ला रहा हूँ   
  
पड़ेशान हुआ था मै अपने ही डाक्टर से,  
जिसने किया था गलत उपचार अपने ही हाथो से   
  
बच गई जान क्या बताऊ कैसे,   
अस्पताल से भाग निकला जैसे तैसे   
घर आने के बाद था मेरा बुरा हाल ,  
कभी सरदर्द कभी पैरदर्द से था बेहाल   

जान तो बची पर हजारों का हुआ नुकसान ,
बुरा हाल था, नहीं मिल रहा था कोई समाधान

फिर वकील बाबु से मिलने का आया  ख्याल,
जाकर मिला और बता दिया अपना हाल
वकील ने झतिपुर्ति का मुक़दमा करने की दी सलाह,
फिर क्या था हमने भी, बढ़ा दिया मामला


बात आगे बढ़ी, पहुँच गयी वकालत ,
कंपनसेशन की आस में , तबियत भी हो गयी सही सलामत

दोनों ओंर से आरोप-प्रत्यारोप भी हो गया था शुरू
बन गया था शिष्य अपने वकील का और वो था मेरा गुरु

लोगों ने डाक्टर को आत्मसमपर्ण करने के  लिएसमझाया
हम दोनों के वकील ने भी समझोते के लिए राज़ी करवाया

हम सब वकालत के  बाहर मिले करने को समझोता
दोनों वकीलों के चमचे पहुँच गये वहाँ बिन न्योता
डाक्टर ने मेरे फीस के पचास हज़ार मेज़ पर थमाया
दोनों वकील ने पच्चीस पच्चीस लिए और हमसे हाथ मिलाया

मैंने चिल्लाया दे दो मेरे पचास हज़ार
पर  इसमेंभी कोई बाधा हो तो दे दो केवल पच्चीस हज़ार

वकील साहब ने मुझे समझाया
बचपन की वो कहानी याद दिलाया
वर्षो से यही रीत चली आ रही हैं,
भला दो  बिल्ली की लड़ाई में , कभी बन्दर की हार हुई हैं।